Released in 1986, Jaanbaaz remains one of the most stylish and ambitious films of 1980s Hindi cinema. Produced and directed by Feroz Khan, the film blended family drama, romance, action, and crime within a visually lavis...
View on Facebookकहते हैं, “औरत का पयार वीरानों को आबाद कर सकता है तो औरत का गुस्सा स्वर्ग को भी जलाकर ख़ाक कर सकता है”।
यह एक छोटे से क़स्बे के एक छोटे से परिवार की कहानी है। इस सुनहरा संसार में शंकरलाल अपने तीन छोटे भाई शेखर, मधु और रवि के साथ रहता है।
शेखर को अपने बड़े भाई शंकरलाल की पत्नि की आखरी इच्छा पूरी करने के लिये, अपनी इच्छा के विरुद्ध उसकी छोटी बहन लक्ष्मी के साथ शादी करनी पड़ती है। और अब शेखर और लक्ष्मी के दो फूल जैसे बेटे हैं राम और श्याम, साथ में पल रही है एक मासूम बच्ची शान्ती।
शेखर सेथ चमनलाल की फेक़्ट्री में सुपरवाईजर है जहाँ उसकी इज्ज़त है। वो मज़दूरों का प्यारा है, मजदूरों की यूनियन का लीडर है।
मधु जिसे शंकरलाल ने साहूकारों और अपने पड़ौसी भँवरलाल से रुपया क़र्ज लेकर पढ़ाया है अब पढ़ लिखकर अपने ही जिले में कलक्टर बनकर आ रहा है। सब ख़ुश हैं और सबको यकीन है कि अब इस परिवार के सारे कष्ट दूर हो जायेंगे, सारे क़र्जे उतर जायेंगे। रवि अभी अल्हड़ नौजवान है और पढ़ रहा है।
फ़क्ट्री की हालात ख़राब है और मजदूरों को कई महीने से तनख़्वाह नहीं मिली है। मज़दूर हड़ताल करना चाहते हैं। शेखर उन्हें समझा बुझा कर सेठ चमनलाल से बात करने जाता है। जहाँ उसे पता चलता है कि फ़क्ट्री बिक रही है और खरीद रही है कोई रानी पद्मावति। वही अब मज़दूरों की माँगे पूरी करेंगी।
सेठ चमनलाल शेखेर के भाई मधु को जो कलक्टर बन कर आया है अपने घर दावत देते हैं। सेठजी की इकलौटी बेटी शोभा और मधु एक दूसरे को देखते ही प्यार करने लगते हैं। सेठ को दामाद के रूप में कलक्टर मिल रहा हो और एक साधारण परिवार को बहू के रूप में सेठजी की बेटी मिल रही हो तो क्या हो सकता है? सबकी सहमति से मधु और शोभा की शादी हो जाती है।
बड़े भाई शंकरलाल को अपने सब सपने पूरे होते हुये से लगते हैं। मगर महलों में लाड़ प्यार और नाज़ों से पली शोभा शंकरलाल के मामूली घर और परिवार की शोभा नहीं बन सकी। घर की शान्ति और परिवार का सुख चैन दिन रात के झगड़ों से उजड़ने लगा। दिलों और घर में दीवारें खींचने लगीं, दीवारों में दरारें पड़ने लगीं।
रानी पद्मावति ने फेक्ट्री खरीद कर उस पर ताला लगा दिया। मजदूर अब तक उम्मीदें लगाये बैठे थे रानी के पास अपनी फरियाद और शिकायतें लेकर आये। रानी उनकी शिकायतें दूर करने और मांगें पूरी करने के लिये तैयार हो गई। मगर शर्त यह थी कि उनके लीडर शेखर को नौकरी से निकाल दिया जाये। शेखर बेक़सूर था मज़दूरों का प्यार था। मज़दूर भड़क उठे। उन्होंने हड़ताल शुरू कर दी, भूख हड़ताल शुरू कर दी।
मज़दूरों के पेट कमर से लग गये बच्चे भूख से बिलखने लगे। शेखर से यह सब देखा न गया। उसने मज़दूरों को समझाया कि उसकी खातिर वो तक़लीफ न उठाकर रानी पद्मावति की शर्ते मान लें।
मधू कलक्टर और सेठ का जँवाई बन गया तो साहूकार और लेनदार शंकरलाल से अपना क़र्जा माँगने लगे। शंकरलाल को अपने छोटे भाई मधु पर पूरा भरोसा था मगर बदले में उसे मिला अपमान और निराश, बहू के ताने और जली कटी बातें। तब शेखर की पत्नि लक्ष्मी ने अपने गहने देकर घर की लाज रखी।
रानी पद्मावति ने मधु और शोभा को अपने परिवार के खिलाफ़ भड़काया और नतीजा यह हुआ कि भाई भाईयों से अलग हो गया। सुनहरे संसार की दीवारे एक-एक करके ढहने लगीं। मुसीबतों के पहाड़ा टूट पड़े।
रानी पद्मावति ने चोरी और गबन का इल्ज़ाम लगाकर शेखर को जेल भिजवा दिया। कर्जदारों से हुण्डियाँ और गिरवी के कागज़ ख़रीद कर शेखर और शंकरलाल का घर ज़मीन जायदाद सब अपने नाम करवा दिया। कुर्की आई नीलामी हुई और शेखर का परिवार सड़कों पर आ गया।
शेखर जब जेल से छूट कर आया तो उसका सुनहरा संसार उजड़ चुका था। उसके बच्चे भूख से तड़प रहे थे। बाप जैसा बड़ा भाई शंकरलाल कुली का काम कर रहा था। छोटे भाई की पढ़ाई छूट गई थी।
शेखर नौकरी की तलाश में जहाँ भी जाता ठुकरा दिया जाता क्योंकि रानी पद्मावति का मन इस साया उसके पीछे लगा हुआ था। शंकरलाल के परिवार का, सुख-चैन मान-मर्यादा सब कुछ लूट चुका था, तबाह हो चुका था और इस तबाहों के हर काम के पीछे रानी पद्मावति का हाथ था। रानी पद्मावति का गुस्सा था।
यह रानी पद्मावति कौन है?
रानी पद्मावति का शेखर से क्या बैर है? वो क्यों उसे और उसके सुनहरे संसार को तबाह और बरबाद करने पर तुली हुई है?
यह सब जानने के लिये, देखिये “सुनहरा संसार”।
(From the official press booklet)