ऋषि मार्कन्ड की सेवा से भीलराज बाहुक के यहाँ कन्यारत्न का जन्म हुआ, जिसका महामुनि मार्कन्ड ने नाम रखा शबरी। गुरु की छत्र छाया में शबरी ने वीरता और प्रभू भक्ति का पाठ सीखा। उसने पशुबलि के विरुद्ध अपनी जान की बाज़ी लगाकर उसे बन्द करवा दिया और परमात्मा पर अपने अखण्ड विश्वास के बल पर रावण के राक्षसों को भी सबक सिखा दिया।
भीलकुमार मुन्डेश्वर ने शबरी के प्रिय हिरन सच्चिदानंद को अपने तीर का निशाना बना दिया। शबरी ने हिंसक के साथ विवाह नहीं करने की प्रतिज्ञा की। भाग्य का लेखा मुन्डेश्वर ने स्वयंवर जीता, किन्तु शबरी सुख चैन और गुरु की छाया छोड़कर नदी में कूद पड़ी, तब खुद भगवान ने भक्त को बचा के रिषियों की सेवा के लिए उसे पंपा सरोवर पहुँचाया।
महामुनि मतंग न शबरी के भक्त हृदय को पहचान के अपने आश्रम में आश्रय दिया। किन्तु समय ने पलटा खाया और सेवा करती हुई शबरी को दूसरे मुनियों ने अछूत भीलनी के रूप में देखकर, झगड़ा किया, बहिष्कार किया और अत्याचार भी किए। इस दुख के दर्द ने आखिर महामुनि मतंग के प्राण ले लिए। लोगों ने अकेली शबरी को डाँट धमकी देकर तपोवन से निकालना चाहा, जिन्दा जलाना चाहा, लेकिन शबरी आखिरी दम तक भगवान में विश्वास, श्रद्धा और भक्ति रखके सब संकटों से पार हो गई, आखिर भगवान को उसके आश्रम में आना पड़ा और उसके जूठे बेर खके उन्होंने ऊँच-नीच का भेद तोड़ दिया। विरोधी रिषि भी शबरी के चरण धोकर अपने पापों का प्रायश्चित करके पावन हो गए।
(From the official press booklet)