एक गाँव में महेन्द्र नाम का एक विवाहित युवक रहता है। उसका छोटा भाई सुरेन्द्र भी अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उसके पास गाँव में आकर रहने लगता है क्योंकि वह नौकरी करने की बजाय खेती के काम को अच्छा समझता है। इसी गाँव में बनवारी लाल भी रहता है जो कपड़े को छोटी-सी दुकान करता है। उसकी बेटी आशा को सुरेन्द्र पसन्द करता है और दोनों की शादी बिना दहेज के कर दी जाती है। ये दोनों परिवार धार्मिक विचारों के हैं और बाबा बालक नाथ के श्रद्धालु हैं।
दुर्भाग्यवश महेन्द्र अपनी ज़मीन का मुकद्दमा बलकारे से हार जाता है। बलकारा इसी गाँव का एक मनचला नौजवान है जिसने कभी अनुचित तरीकों से महेन्द्र की जमीन हथिया ली थी। बलकारे की नज़र आशा पर भी थी, परन्तु आशा की शादी सुरेन्द्र से हो जाने पर वह सुरेन्द्र का भी दुश्मन हो जाता है। सह सुरेन्द्र को अपने रास्ते से हटा कर किसी भी तरह आशा को पा लेना चाहता है। इसके लिए वह अनेक चालें चलता है, षड्यंत्र रचता है और हिंसा का सहारा भी लेता है। पड्यंत्रों में गाँव का एक पाखंडी साधु उसके साथ है।
दूसरी तरफ महेन्द्र, सुरेन्द्र और आशा के साथ गाँव के एक सन्त बाबा हैं जो उन्हें सदा प्रेरणा देते रहते हैं कि वे बाबा बालक नाथ पर पूरा भरोसा रखें, वही न्याय करेंगे और दुश्मन को उसकी करनी का फल देंगे।
पाखंडी साधु की एक साजिश के कारण आशा ओर सुरेन्द्र को घर छोड़ना पाड़ता है क्योंकि वह महेन्द्र और उसकी पत्नी लाजो को बहकाने में सफल हो जाता है कि आशा के कारण तुम्हारे परिवार पर संकट आ रहे हैं। अब आशा और सुरेन्द्र सन्त बाबा की कुटिया में रहने लगते हैं जहाँ आशा बेटे को जन्म देती है।
समय रहते बलकारा अपनी चालें चलता रहता है और आशा तथा सुरेन्द्र सन्त बाबा की प्रेरणा तथा बाबा बालक नाथ पर अटल विश्वास रखते हुए उन चालों का सामना बड़े साहस एवं धैर्य के साथ करते रहते हैं।
फिर एक समय ऐसा भी आता है कि बलकारे के घमंड को चूर करने के लिए, उसके अत्याचारों को समाप्त करने के लिए, उसे सबक सिखाने के लिए आशा और सुरेन्द्र की भक्ति को शक्ति प्रदान करने के लिए बाबा बालक नाथ को स्वयं आना पड़ता है और इस प्रकार उनके चमत्कारों तथा शक्ति के सामने बलकारा और उसके साथियों को झूकना पड़ता है। केवल झुकना ही नहीं पड़ता बल्कि उन्हें भी बाबा बालक नाथ की शक्ति को मानना पड़ता हैर और जिस आशा को पाने के लिए बलकारा इतनी घिनौनी चालें चलता है, अन्ततः उसी को बहन मान लेता है और उसे हथियाई हुई जमीन के कागजात भी भाई की ओर से उपहार-स्वरूप लौटा देता है।
इस प्रकार बाबा बालक नाथ की कृपा से बदी पर नेकी की, झूठ पर सच्चाई की जीत होती है और सारा वातावरण सुखद हो आता है।
[From the official press booklet]