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कल ऐक्सट्रा था आज हीरो हूँ - Sanjeev Kumar

23 Jun, 2026 | Archival Reproductions by Cinemaazi

स्कूल के बहाने किसी फिल्म स्टूयिो गेट पर खड़े-खड़े आती जाती कारों में बैठे अभिनेता-अभिनेत्रियों को हसरत भरी नजरों से देखते-देखते, आज ’माधुरी’ के नवरत्न चुनाव में अपनी भी विजय देख कर मुझे केसा लगता है? यह तो मुझसे बयाँ होना मुश्किल है, मगर इस शेर की सत्यता को मैं और भी गहराई से अपने भीतर महसूस कर रहा हूँ।

 

मिटा दे अपनी हस्तीको
अगर कुछ मर्तबा चाहे
कि दाना खाक में मिल कर
गुलो गुलजार होता है
आज जब भी अपनी कहानी को शुरू के सफे से पढ़ना शुरू करता हूँ तो लगता है कई संजीव कुमार मेरे साथ थे जो हर पड़ाव में मुझसे छूट गये, फिर कई संजीव मेरे साथ हो लिये; फिर छूट गये। लगता है यह साथ होने और फिर अलग हो जाने का सिलसिला चलता रहेगा।
हम हिंदुस्तानी’ फिल्म में एक संजीव कुमार था जो मामूली ऐक्स्ट्रा था। जिसे कुछ डायलाॅग बोलने थे, जिसकी एवज में उसे कुल तीस रुपये मिले थे। मगर उन तीस रुपल्लियों में वह फूला नहीं समा रहा था। मन ही मन समझ रहा था जैसे वह चोटी का अभिनेता बन बैठा हो। धड़कते दिल से वह पिक्चर रिलीज होने का इंतजार करता रहा। इसमें वह मुश्किल से दो मिनट के लिए पुलिस की वर्दी में आता है। अपने आपको देखने के लिए यह संजीव कुमार इतना बेचैन था कि न जाने कितनी बार उसने यह पिक्चर देख डाली। लोगों की तरफ ये संजीव कुमार महोदय इस निगाह से देखते ताकि कोई कहे, “अरे यही संजीव है जिसे ’हम हिंदुस्तानी’ में देखा था।” मगर सब अपनी-अपनी राह चल देते।

धीमे-धीमे जूँ भर के काम की भैंस जैसी प्रशंसा पाने के लिए लालायित वह संजीव कुमार कहीं लोप हो गया।

अब जो संजीव कुमार आया वह इप्टा (इंडियन पीपुलस थियेटर एसोसिएशन) के चक्कर इस उम्मीद में लगाने लगा कि यहाँ से देव आनंद और बलराज साहनी जैसे कलाकार फिल्मों में आये क्यूं न अपने को भी ऐसा चाँस मिल जाये...? एक दिन ड्रामा में पार्ट लेने वाला कलाकार नदारत पाया गया। किसी ने संजीव को अविश्वास की नजरों से देखते हुए फरमाया, “यह लड़का रोज चक्कर लगाता है चलो इसे आजमा कर देखा जाये...”

आजमाया गया तो खरे उतरे, फिर कई नाटकों में भाग लिया तो तारीफ की जूँ कुछ फिल्मी हस्तियों के कानों में भी रेंगने लगी। एक दिन ’फिल्मालय स्कूल आफ ऐक्टिंग’ में दाखिला पा लिया।

फिर एक तीसरा संजीव कुमार एक दिन फणि मजूमदार जैसे निर्देशक और ताराचन्द बड़जात्या जैसे निर्माता के सामने खड़ा देखा गया। फिल्म ’आरती’ में उसे हीरो लेने की नौबत आ पहुँची थी। मन में खुशी की नौबतें बज रही थी मगर तभी ’ट्रायल’ के बाद बंदूक की गोली दगी, “यू आर कैंसिल्ड।”

कोई तो मेरा...
मन में उमड़ती खुशी अचानक निराशा भरी ऐसी पीड़ा में बदल गई कि आँखों में उमड़ते आँसू रोके न रुके। कोई तो ऐसा होता जो कलपते इस संजीव कुमार की पीठ पर सांत्वना का हाथ फेरता। मगर ऐसा कोई न था। खैर यह संजीव भी नदारत हो गया।

अब जो संजीव कुमार आया उसके हाथ में तलवार थी। वह तीसरे दर्जे की एक स्टंट फिल्म में अकेला कई लड़ाकों को मार रहा था। यह पिक्चर थी ’निशान’ जो बंबई के किसी घटिया हाल में ऐसी चली कि तीन दिन में उतर गई। मारे गये... अब क्या होगा?

और फिर जिंदगी के उस क्षण को जो आज स्मृतियों में एक अनमोल धरोहर बन कर रह गया है कभी नहीं भुलाया जा सकता। ’दिल दिया दर्द लिया’ के सेट पर संजीव जा पहुँचा था। तमाम जूनियर कलाकारों ने उसे घेर लिया था। सबने ’निशान’ फिल्म में किये गये उसके अभिनय की तारीफ की। तय किया सब एक-एक रुपया चंदा करके उसकी फिल्म चलायेंगे...

इतना स्नेह संजीव पर लद गया कि उसकी आँखें नम हो आई।
 
संजीव कुमार एक मगर रूप अनेक
रेल चल पड़ी
वक्त बीतता जा रहा था। स्टंट फिल्मों वाला संजीव छोटी मोटी भूमिकाओं के जरिये सामाजिक फिल्मों में भी घुस पैठ मचाता रहा। कामयाबी मिलती रही और एक बार जो गाड़ी चलनी शुरू हुई तो चलती रही और आज तक चल रही है।
तो अब जो संजीव कुमार आपके सामने है वह कई फिल्मों का हीरो है। एक मामूली एक्स्ट्रा से के. आसिफ की ’मुहब्बत और खुदा’ तक पहुँचते-पहुँचते उसने कई रूप बदले। मामूली भूमिकाओं से प्रमुख भूमिकाओं तक पहुँचते-पहुँचते उसने कई तजर्बे हासिल किये। और अब अगर इन तजर्बों का निचोड़ आप निकालें तो वही शेर याद कीजिये जो मैंने इस लेख में पहले ही लिख दिया है।

स्टंट फिल्मों में काम करते हुए मुझे लगा था इन फिल्मों को देखने वाले अलग ही क्लास के लोग हैं। सामाजिक फिल्मों को देखने वाला वर्ग भी अलग ही है। अतः सामाजिक फिल्मों में मुझे जैसे भी रोल मिले, अपनाता चला गया। ’पति पत्नी’, ’संघर्ष’, ’शिकार’, ’आशीर्वाद’, ’सत्यकाम’, ’साथी’ जैसी फिल्मों में सहायक कलाकार की भूमिका निभाते-निभाते मुझे महसूस हुआ मैं सब तरह के दर्शकवर्ग की आँखों में चढ़ गया हूँ। यह सच्चाई भी मेरे सामने प्रकट हुई कि दर्शकों में किसी भी कलाकार की प्रतिभा को पहचानने की पूरी-पूरी क्षमता होती है। यह मेरे लिए गर्व की बात भी और है कि मुझसे दर्शक निराश नहीं हुए और उन्हीं की प्रशंसा की बदौलत मुझे ’शिकार’ फिल्म में सहनायक की श्रेष्ठ भूमिका के लिए ’फिल्मफेयर एवार्ड’ मिला।

और अब... अब मैं अपने चाहने वालों को यह सूचना भी देना चाहता हूँ कि वे भविष्य में जिस संजीव कुमार को देखेंगे वह सहनायक नहीं होगा बल्कि नायक होगा।

सच्चाई’ फिल्म सहनायक की भूमिका वाली मेरी आखिरी फिल्म है। इसमें मैंने बतौर सहनायक के अपनी दृष्टि में सर्वश्रेष्ठ अभिनय किया है।

अब मुझे यह भी महसूस होता है लगातार फिल्मों को लेते रहना मानसिक और शारीरिक शक्ति का अपव्यय है। साल में थोड़ी सी फिल्में हों, जिनमें मन लगाकर काम किया जा सके। आप लोगों के प्रेम ने मेरे अंदर ऐसा आत्मविश्वास भर दिया है कि अब मैं उस असुरक्षा की सूली अपने ऊपर लटकती महसूस नहीं करता जिसकी वहज से हर कलाकार को विवश हो कर दर्जनों फिल्में स्वीकार करनी पड़ती हैं।

मैं प्रचार से दूर
फिर याद कीजिये उस संजीव कुमार को जो मामूली एक्स्ट्रा का रोल करने के बाद चाहता था लोग उसके काम की प्रशंसा करें। मगर किसी ने प्रशंसा नहीं की। तब कराहते हुए मन को इसी विचार ने सांत्वना दी थी कि प्रशंसा तभी होती है जब कलाकार अपने काम से इसका हकदार बनता है। झूठी प्रशंसा कलाकार को पतन की गहराइयों में धकेलती है।
शायद तभी से मैं जिस रूप में भी जिया, एक बात से हमेशा कतराता रहा, वह है प्रचार। मैंने कभी भी किसी फिल्मी पत्रकार को अपने बारे में कुछ लिखने के लिए नहीं कहा। आज तक मैंने कोई प्रेस कानफ्रेंस नहीं बुलायी, जिसमें अपनी उपलब्धियों का बिगुल स्वयं बजाया हो। मेरी आत्मा इसके लिए कभी तैयार नहीं होती। मुझे ’संघर्ष’ में दिलीप साहब के साथ काम करने का अवसर मिला। तब मैं नया था। चाहता तो इस बात का जोरों से प्रचार करवा सकता था, मगर मुझे लगा अपने आप स्वयं का प्रचार करना नैतिक दृष्टि से भी घातक है। ’मुहब्बत और खुदा’ जैसी महान फिल्म का हीरो होने पर भी मैंने ’पब्लिसिटी डिपार्टमेंट’ रखने की जरूरत नहीं महसूस की। इसका सुखद परिणाम यह हुआ कि पत्र पत्रिकाओं में मेरी जो भी प्रशंसा छपी वह निष्पक्ष थी।

खैर मुझे उम्मीद है, ’माधुरी’ के पाठकों ने नवरत्नों में एक चुन कर मुझे जो अपार स्नेह दिया है वह कभी नहीं घटेगा। अपनी आने वाली फिल्मों में मैं अपने चाहने वालों के सामने बेहतर से बेहतर ढंग से प्रस्तुत होने की कोशिश करूंगा।

नमस्ते।

This article was published in 'Madhuri' magazine's 6 March 1970 edition.
The images and captions are from the original article.

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