पं. केदार शर्मा (Kidar Sharma) – छाया-छलना के जाग्रत शिल्पी
हारमोनियम बजाने का शौक जब मिरासी बनने की बुनियाद माना जाता था और फिल्म देखने वाले की गिनती भ्रष्ट लोगों में की जाती थी, खाते पीते एक सभ्य और सुसंस्कृत परिवार का युवक सबके विरोध के बावजूद खम ठोक कर खड़ा हो गया, “मैं कुछ करूंगा तो सिर्फ फिल्मों में।”
पिता की आशाएं चूर हो गयीं। वे स्वभाव से कलाकार जरूर थे, पर बेटा पढ़ लिख कर प्रोफेसर बनने के बजाय और कुछ करे यह उन्हें मंजूर नहीं था। फिर काम भी क्या? सिनेमा!
लेकिन जिस तरह पिता पक्के थे, उसी तरह बेटा भी दृढ़ निश्चयी था। नतीजा यह कि एक दिन वह पढ़ा लिखा, एम.ए. पास युवक अपना शहर अमृतसर छोड़ कर घर से भाग निकला।
तब के उस युवक की तारीफ उसी के शब्दों मेंः “न कद लंबा था, न शरीर मजबूत था, न बाहों में मछलियाँ उभरती थीं, न आवाज में बुलंदी थी, न कोई अनुभव था न किसी की तगड़ी सी सिफारिश...”
फिर भी वह युवक फिल्म जगत में आकर सफल हुआ और सफलता भी ऐसी कि वह सिर्फ मशहूर व्यक्तित्व ही नहीं, एक संख्या बन गया। लेखन, निर्देशन, निर्माण- जिस किसी क्षेत्र में कदम रख लिया, बस चोटी पर ही दिखाई दिया।
मगर यह सफलता महज उसके चाहने से उसकी झोली में नहीं आ गिरी। इसके पीछे है अविराम संघर्ष, लगन और निष्ठा की लंबी कहानी जिसका विस्तार किसी पत्रिका के कई अंक शायद मिलकर ही समेट सकें।
इसलिए यहाँ प्रस्तुत हैं जीवन के किसी किसी स्मरणीय क्षण के कोई कोई अंश जो तब के उस उद्दंड युवक, आज के सफल निर्माता, चित्रकार, लेखक, अभिनेता केदार शर्मा को कभी हंसाते हैं, कभी रुलाते हैं।
जिंदगी की पहली प्यासी रात
घर से भाग जाना किसे कहते हैं, यह तब समझ आया जब घर छोड़ दिया था और इस कदम को वापस लेने में जवानी की तौहीन होती लगी। अमृतसर से निकले कदम सीधे कलकत्ता जाकर थमे। फिल्म के अभिलाषियों का मक्का तब वहीं होता था।
कलकत्ता पहुँचे तो पता चला, किसी को उस छोटे, दुबले पतले नवयुवक की तरफ देखने की फुरसत नहीं है। हर किसी को जैसे कोई बहुत जरूरी काम है।
जेब से मुड़ा तुड़ा कागज निकाला। लंबे सफर में उसकी दुर्दशा जरूर हो गयी थी पर सरदार ठाकुर सिंह का नाम और पता अभी साफ पढ़ा जा सकता था। सरदार ठाकुर सिंह मशहूर पेंटर रहे हैं। पेंटिंग के क्षेत्र में उन्हें बड़ा नाम और प्रतिष्ठा मिली। इन्हीं सरदार जो के आंगन में केदार शर्मा को पहले पहल छांव मिली और आज भी केदार शर्मा के लिए उनका घर मंदिर है।
सरदार साहब के घर में रहने खाने की सब सुविधा थी पर केदार ने निश्चय कर रखा था कि न्यूनतम जरूरत ही वहाँ से पूरी करेंगे। इन जरूरतों में रात को सोना और नहाना धोना मात्र ही शामिल था। इस ’नहाने धोने’ में ’नहाना’ तो ठीक मगर ’धोने’ में रोज रोज शेव करके उस्तरा धोना पोंछना सरदार जी की श्रीमती जी की कट्टर सिख भावनाओं को बहुत ठेस पहुँचाता था।
केदार पैसेज में सोता था और रसोई में, जहाँ पीने के पानी की सुराही रखी रहती थी, जाने का रास्ता सरदार साहब के बेडरूम में से था। एक रात जब केदार शर्मा बुखार में तप गये और जी पानी के बिना तड़प गया, उनकी हिम्मत दरवाजा खटखटा कर रसोई में जाने की नहीं हुई। घर के अंदर जाने के बजाय बाहर चला जाना ज्यादा आसान लगा।
जाने उस रात आसपास के सारे इलाके में किसी बड़ी पाइप लाइन की मरम्मत की वजह से पानी बंद था या रात को सार्वजनिक नल बंद ही कर दिये जाते थे, कहीं एक बूंद पानी नहीं मिला। होटल दुकानें सब बंद ही हो चुकी थी।
उस प्यासी रात ने नवयुवक केदार को एक नयी दृढ़ता दी, सहन शक्ति की नयी सीमा दी। बाकी सब दुःख इससे तो छोटे होंगे।
सहारा दोस्तों और आत्मविश्वास का
सुना था देवकी बोस बहुत बड़े आदमी हैं और वे चाहें तो न्यू थियेटर्स में कुछ काम जरूर मिल सकता है। मगर देवकी बोस से मिलना तो दूर, किसी स्टूडियो के गेट के भीतर तक कदम नहीं पहुँच पा रहा था। लंबा चैड़ा पठान दूर से देख कर ही हांक लगा देता, “खोचे, इदर किदर?”
अब उसे क्या बताएं किधर।
तभी लंबा चैड़ा एक दूसरा पठान काम आ गया। केदार शर्मा को खबर मिली थी कि पंजाब से आए दो और युवक फिल्मों में काम कर रहे हैं। एक का नाम है पृथ्वीराज कपूर और दूसरा है के.एल. सहगल। दोनों साथ ही टालीगंज ब्रिज के पास एक कमरा लेकर रहते हैं।
ढूंढते पूछते पहुँच गये वहाँ। पहचान हुई। दोनों ने केदार शर्मा को मदद का भरोसा दिलाया। सहगल ने तरकीब सोची कि किस तरह देवकी बाबू से मिलाया जाय। रास्ता बना अभिनेत्री दुर्गा खोटे के जरिये। वे सहगल की बात मानती थीं। उन दिनों वे कलकत्ता में ’सीता’ फिल्म की नायिका थीं।
मुलाकात का बंदोदस्त हो गया। देवकी बाबू रौबदार व्यक्तित्व के मालिक थे। केदार शर्मा को देखते ही पूछा, “तुम क्या काम कर सकते हो?”
उनके सामने पड़ कर लोग कांप जाते थे। जवाब नहीं सूझता था। संभल कर केदार शर्मा ने जवाब दिया, “मैं निर्देशन से लेकर कुली तक का काम कर सकता हूँ।”
“निर्देशन का काम मैं बखूबी कर लेता हूँ।” उन्होंने कहा, “और कुली का काम तुम जैसे दुबले पतले आदमी के बस का नहीं, तुम जा सकते हो।”
केदार शर्मा ने कभी सोचा भी नहीं था कि इंटरव्यू इतना अक्खड़ और संक्षिप्त होगा। सारी तैयारी धरी रह गयी मगर युवक केदार ने सबक सीख लिया, अपने में असीम विश्वास और धैर्य पैदा करना होगा। सामने वाला व्यक्ति कोई साधारण इंसान नहीं है। आज तक देवकी बाबू के बारे में बहुत कुछ सुना था, अब उन्हें देख कर उनके प्रति आदर और बढ़ गया।
वक्त ने सिखाया था कि विश्वास बड़ी चीज है और इस जानकारी को सूम के धन की तरह केदार शर्मा आज भी गाँठ बाँध कर रखे हुए हैं। देवकी बोस से पहली भेंट ’फ्लाॅप’ हो गयी थी। दूसरी बार साहस के साथ फिर मिले। इस बार केदार शर्मा अपने साथ अपनी बनायी हुई कुछ पेंटिंग्स भी ले गये थे। देवकी बाबू को वे पसंद तो आयीं फिर भी उन्होंने पूछा, “तुम और क्या कर सकते हो?”
“मैं अव्वल दर्जे का फोटोग्राफर भी हूँ।” उन्होंने बेझिझक जवाब दे दिया।
“इन दिनों मैं दूसरों को प्रभावित करने के लिए बड़ा सूट बूट सजाये रहता था,” केदार शर्मा अपने बीते दिनों की बात बताते हुए कहते हैं। “फोटोग्राफी के नाम पर बाक्स कैमरा देखा था, बस। लेकिन कुछ स्वर का विश्वास, कुछ सूट की शान दोनों का मिला जुला असर ऐसा हुआ कि उन्होंने कह दिया, “अच्छी बात है, तुम स्टिल्स का काम करो।”
उन दिनों आजकल की तरह पैनक्रोमैटिक फिल्म का रिवाज कम था। जितनी बड़ी फोटो लेनी हो, उतनी ही बड़ी प्लेट लगा कर फोटो ली जाती थी। फोटो खींचने को उन्हें 10x12 इंच के आकार की बहुत सी प्लेटें दी गयीं। केदार शर्मा ने बड़ी सावधानी के साथ फोटो खींच भी लीं लेकिन जब वे धुलने के लिए दी गयीं तो डार्करूम के आदमी ने शरारत करके उन्हें गलत रसायनों में डाल दिया और परिणामस्वरूप फोटोग्राफ की जगह निकल आयी फोटोग्राफी की साफ चमचमाती फिल्म जिसके आरपार साफ दिखाई दिया करता है।
केदार की ’कला’ का ’कमाल’ तुरंत देवकी बोस तक पहुँचा दिया गया। जवाबदेही के लिए उन्होंने केदार शर्मा को बुलाया।
“अपनी फोटोग्राफी के नतीजे देखे तुमने?” उन्होंने उन फिल्मों को केदार के सामने रखते हुए पूछा।
“जी, हाँ देखे।” केदार ने कहा। “सब बिल्कुल साफ है, मेरी ’कंशस’ की तरह।”
जवाब सुनकर देवकी बोस कुछ चैंके। इस युवक की हर बात कुछ अजब होती है। डार्करूम में काम करने वाले की कुछ शरारत का भी उन्हें आभास हो गया।
“अच्छी बात है, तुम हमारे सामने फोटो खींच कर खूद उसे डेवलप करके दिखाओ।” उन्होंने कहा।
केदार के लिए यह दूसरी मुसीबत थी। फोटो किसी तरह खींच तो ली जाएगी, क्योंकि कैमरा तो कम से कम पहले देखी हुई चीज है पर डेवलपिंग? यह काम पढ़ा तो है, किया कभी नहीं, अब क्या होगा?
डेवलपिंग के लिए पहुँचे तो ख्याल आया प्लेट को रसायन में रखने की एक निश्चित अवधि होती है। लेकिन कितनी? सात मिनट? ग्यारह मिनट? तीन मिनट। बड़ा कन्फ्यूजन पैदा हुआ, क्या करें।
केदार शर्मा कहते हैं, “आखिर उसी ऊपर वाले को याद किया जो पग पग पर मेरी बिगड़ी बनाता आया है। किसी गाने की एक लाइन याद थी, ’नाथ तैने गज के बंद छुड़ाये...’
इसी लाइन को डेवलपिंग का सही टाइम मान कर गाना शुरू किया। जब रिजल्ट देखा तो देगेटिव एकदम परफेक्ट था...”
देवकी बाबू प्रसन्न हो गये। “तुम काम करते रहा,” उन्होंने कहा था लेकिन केदार शर्मा अगली सुबह अपना इस्तीफा उनकी मेज पर रख आए।
उस दिन इत्तफाक से, भाग्य से, भगवान की कृपा से या अपने विश्वास के सहारे संकट की घड़ी पार हो गयी लेकिन मन ही मन केदार शर्मा ने प्रण लिया, ’फोटोग्राफी’ पर ’मास्टरी’ करके रहूँगा।”
समय के साथ उनका प्रण पूरा हुआ और फोटोग्राफी में भी केदार शर्मा ने नाम कमाया। आजकल भी उनके खींचे चित्र मशहूर पत्रिकाओं में प्रकाशित हेते रहते हैं।
अनगही मेरी नहीं है बांह
देवकी बोस ने केदार की पेंटिंग्स देखी थीं और देख कर उन्हें लगा था कि लड़के में प्रतिभा है। इसलिए जब केदार ने न्यू थियेटर्स में स्टिल फोटोग्राफर का काम छोड़ा, देवकी बोस ने उन्हें पोस्टर बनाने का काम सौंप दिया।
घर से भाग कर केदार शर्मा पोस्टर पेंटर बनने नहीं आये थे। एक तमन्ना थी एक्टर बनने की, लेकिन दबी दबी, जिसे उन्होंने बाद में ’नेकी बदी’ में पूरा किया। पोस्टर पेंटिंग के साथ साथ इन दिनों उन्हें धुन थी लेखक बनने की लेकिन उसका कोई अवसर हाथ नहीं आ रहा था।
मूसलाधार बारिश भरी वह सुबह शायद केदार शर्मा के भाग्य का सूरज चमकाने ही इस तरह आयी थी। रास्तों में पानी भर गया, कीचड़ हो गयी पर पानी बंद नहीं हुआ। मामूली पोस्टर पेंटर केदार शर्मा के पास न छाता न बरसाती। बरसात थमती न देख, युवक केदार निकल पड़ा यूँ ही भीगते-भीगते। स्टूडियो का रास्ता अभी आधा बाकी था। सिर से पैर तक बुरी तरह भीग जाने की वजह से बालों से, कपड़ों से पानी टपकने लगा...
तभी एक शानदार गाड़ी उनके एकदम पास आकर रुकी। केदार शर्मा को कभी स्वप्न में भी ख्याल नहीं आया था कि उनके लिए भी कोई गाड़ी रुक सकती है। वे सड़क पर और भी किनारे होकर अपनी राह चलते चले गये।
गाड़ी फिर जरा सरक कर उनके पास आ पहुँची। पलट कर जो देखा, न्यू थियेटर्स के कर्ता धर्ता बी.एन. सरकार उन्हें अंदर आने का इशारा कर रहे हैं।
केदार शर्मा ने एक बार उस चमचमाती हुई कार को देखा फिर अपने कपड़ों जूतों को देखा। श्री सरकार उनकी झिझक समझ गये। उन्होंने फिर इशारा किया और इस बार केदार शर्मा ने कार का दरवाजा खोल अंदर बैठ जाने का इरादा तो कर लिया लेकिन इतनी बढ़िया कार पहले कभी देखी नहीं थी। मालूम नहीं पड़ा कि दरवाजा खुलता कैसे है। सरकार साहब खुद बढ़कर दरवाजा खोलें, इसके पहले ही केदार शर्मा ने जोर से आवाज लगायी “खुल जा सिमसिम” और इसी क्षण सरकार साहब ने दरवाजा खोला। दोनों बातें एक ही क्षण इतने सही समय से हुई कि सरकार जैसे गंभीर आदमी भी बिना मुस्कराये नहीं रह सके।
केदार शर्मा यह देख कर चकित थे कि न्यू थियेटर्स का इतना बड़ा स्तंभ, जिसके नाम से लोग इस कदर घबराते हैं, उन्हें इस तरह सड़क से साथ बिठा लाया है और अब इन भीगे कपड़ों जूतों की वजह से हो रही कार की दुर्दशा पर तनिक भी ध्यान नहीं दे रहा है। उधर शायद सरकार साहब सोच रहे थे कि यह लड़का कुछ अलग ही ढंग का लगता है। यूँ ही उन्होंने पूछा, “काम कैसा चल रहा है?”
सीधा जवाब तब केदार शर्मा को सूझता ही नहीं था। उनके अंदर जो एक कलाकार था, वह हर समय अभिव्यक्ति के लिए छटपटाया करता था और फिर जब सामने कद्रदां मौजूद है तो क्यों मौके को चूका जाय? अवसर बार बार तो आता नहीं! उन्होंने कहा, “क्लाइव ने एक बार कहा था, ’मेरे हाथ में कलम की जगह बंदूक दो और फिर देखो मैं क्या कर दिखाता हूँ।’ मैं कहना चाहता हूँ मेरे हाथ में ब्रूश नहीं, कलम दीजिए।”
उस वक्त सरकार बाबू ने कोई जवाब नहीं दिया लेकिन अगले रोज केदार शर्मा को अपने दफ्तर में बुला भेजा, “तुम शरतचंद्र की कहानी देवदास पर इसी नाम से बन रही हमारी फिल्म के संवाद लिखोगे।” यह जैसे सूचना नहीं, आज्ञा थी।
केदार शर्मा चैके, लेकिन उनसे भी ज्यादा चैंके वहाँ काम करने वाले दूसरे लोग। सरकार साहब यह क्या कर रहे हैं? यह कल का लड़का क्या संवाद लिखेगा? अपनी नाराजी उनके सामने भी कुछ लोगों ने प्रकट कर दी, पर बी.एन. सरकार निर्णय ले चुके थे। वे अपना फैसला बदलने को राजी नहीं थे और इधर केदार शर्मा की किस्मत का सितारा उदय हो चुका था जिसे अभी बहुत बुलंदी पर पहुँचना था। वह भला इन छोटे मोटे व्यवधानों से कहाँ छिपने वाला था।
चित भी मेरी, पट भी मेरी
’कल के लौंडे’ ने जब संवाद लिखने शुरू किये, मुंशी किस्म के पुराने लेखकों में घबराहट पैदा हो गयी। छोकरा सचमूच बढ़िया काम कर रहा था...
...देवदास के पीछे दीवानी वेश्या चंद्रमुखी उसी की वजह से अपना पेशा छोड़ कर बैठ गयी। देवदास बहुत दिन में लौटा। चंद्रमुखी ने उसे सब बताया... “मैंने धंधा करना छोड़ दिया... चुन्नीलाल एक बार दलाली के लिए आया था...”
“काहे की दलाली?” देवदास ने भोलेपन से पूछा।
देवदास के इस ’ज्ञान’ का चंद्रमुखी क्या जवाब दे! तुनक कर बोली, “गेहूँ की!”
यह ’गेहूँ’ वाली बात शरतचंद्र तक पहुँची। शरतचंद्र की प्रतिक्रिया थी, “मेरे लेखन को इस लेखक ने कुछ और सुधार दिया है।”
पुराने लोगों के पास जब कोई हथियार नहीं रह गया था। जब फिल्म बन चुकी और नामावली (क्रेडिटस) लिखे जाने लगे, उनमें से एक ने आकर केदार शर्मा से पूछा, “आपका नाम ’डिसाल्व’ में दिया जाय या ’फेड आउट’ में?”
इनका क्या मतलब है केदार शर्मा को पता नहीं था जबकि पूछने वाले की चालाकी यह थी कि चित्त भी अपनी हो पट भी।
केदार शर्मा का तो सिद्धांत ही था विश्वास! बड़े निर्णायक स्वर में उन्होंने बताया, “मेरा नाम ’फेड आउट’ में दीजिए। नतीजा वही हुआ जिसके लिए शरारत भरा यह सवाल रखा गया था, केदार शर्मा का नाम इतने कम समय के लिए पद पर आया कि आम दर्शक उसे पढ़ नहीं पाया।
पहली नौकरी पहला इस्तीफा
जिस तरह केदार शर्मा की किस्मत में सिर्फ फोटोग्राफर या पोस्टर पेंटर बन कर रह जाना नहीं लिखा था, उसी तरह विधि को यह भी मंजूर नहीं था कि उसका यह वरदपुत्र सिर्फ लेखक बन कर फिल्मों में रहे। उनके लिए तो निर्देशक और निर्माता बनना लिखा था और इस काम का रास्ता बना उस व्यक्ति के साथ हुए मतभेदों से जो अब तक उनके लिए राह बना रहा था।
’देवदास’ के संवादों ने देवकी बोस को बहुत प्रभावित किया था। मगर अपने इस संवाद सहकारी के एक सुझाव पर वे बिगड़ उठे।
’विद्यापति’ फिल्म की शूटिंग चल रही थी। हिंदी संस्करण के नायक थे पृथ्वीराज कपूर। शाट में नायक को कोई खबर देता है कि उसकी पत्नी ने जहर खा लिया है। बंगला फिल्म के लिए जो शूटिंग की गयी, उसमें यह खबर सुनने के बाद नायक समाज की बुराइयों पर एक लेक्चर देता था और फिर उठ कर आराम से जाता था। यह केदार शर्मा को बहुत खटका।
हिंदी फिल्म के लिए पृथवीराज कपूर को संवाद उन्हें ही देने थे। उन्होंने उन्हें कोई संवाद नहीं दिया, बस इतना ही बताया कि ज्यों ही तुम जहर खा लेने की बात सुनो, बगैर जूता तक पहने, उठकर भागना। उस वक्त कुछ कहना बेतुका लगेगा।
रिहर्सल में पृथ्वीराज कपूर ने यही किया। देवकी बाबू देख कर बहुत बिगड़े। कड़क कर पूछा, “तुमसे ऐसा करने को किसने कहा था? पहले जो शाट हुआ, देखा नहीं था?
पृथ्वीराज कपूर चाहते तो बड़े आराम से कह सकते थे कि मैंने ऐसा डायलाग डायरेक्टर के कहने से किया। पर उन्होंने कहा, “मैं समझता हूँ वही ठीक है और केदार शर्मा भी यही चाहते हैं।”
देवकी बोस का पारा चढ़ गया। कोई उनकी बात को गलत साबित करने लगे, यह भला वे कहाँ सह सकते थे। उधर केदार शर्मा भी इस बात के लिए माफी मांगने को तैयार नहीं थे। वे देवकी बोस के लाडले जरूर थे, पर देवकी बोस की नजर में उन्होंने गुनाह किया था। गुस्से में उन्होंने फिल्म की शूटिंग बंद करवा दी।
इधर उधर से केदार शर्मा पर दबाव पड़ने लगा कि वे माफी मांग लें लेकिन गलत काम के लिए झुक जाना उन्हें किसी तरह गवारा नहीं था। परीक्षा की इस घड़ी में पृथ्वीराज कपूर ने उनका पूरा साथ दिया और दोनों ने नयू थियेटर्स की नौकरी से इस्तीफा दे दिया।
जहाँ चाह है वहाँ राह है
अब परीक्षा की घड़ी थी। नौकरी छोड़ दी थी। क्या काम किया जाय? कहाँ जाएं?
देवकी बोस से मतभेद हुआ था निर्देशन के एक मामूली मुद्दे पर। क्यों न यह साबित करके दिखाया जाय कि जो मैं कह रहा था, सरासर गलत ही नहीं था। क्यों न निर्देशन में प्रतिभा दिखा कर उन्हें कायल किया जाय?
बस, धुन के पक्के केदार ने तै कर लिया, “मैं निर्देशक बनूँगा।”
पेंटिंग तो करते ही थे, झटपट एक साइनबोर्ड बना डाला, “केदार शर्मा, फिल्म डायरेक्टर” और लगा दिया अपने एक कमरे के बंगले के बाहर।
एक दिन गुजर गया, दो दिन गुजरे, दस बीस रोज हो गये, घर में राशन खतम हो चला पर फिल्म डायरेक्टर केदार शर्मा को काम देने कोई नहीं आया। पत्नी नाराज होने लगीं, “तुम सिर्फ इस घर में मेरे डायरेक्टर भर हो। बाहर कोई पूछता नहीं। निकालो इस नाम के फट्टे को और कुछ और काम करो।”
“मैं यह मानने को तैयार हूँ कि मैं घर में मुझे भी डायरेक्ट नहीं कर पाता, उल्टा तेरा ही डायरेक्शन चलता है यहाँ, पर मैं डायरेक्टर के नाम का अपना फट्टा उतारने को तैयार नहीं,” उनका उत्तर था।
...और चूँकि बोर्ड काफी दिन से दिखाई दे रहा था, दो ’गाहक’ एक रोज डायरेक्टर साहब को ढूंढते हुए आ भी पहुँचे। एक थे आज के मशहूर कैमरामैन मल्होत्रा और दूसरे आज के प्रोड्यूसर तलवार साहब। फिल्म कार्पोरेशन की एक फिल्म ’तुम्हारी जीत ’, जिसके छायाकार मल्होत्रा साहब थे, थोड़ी बन कर किन्हीं कारणों से अटकी पड़ी थी। इसलिए मजबूरन ये लोग केदार शर्मा के पास आये थे। केदार शर्मा भला काम से इंकार क्यों करने लगे थे?
कैमरामैन मल्होत्रा शायद भांप गये थे कि यह युवक डायरेक्टर नया नया है। केदार शर्मा की परीक्षा लेने के अंदाज में उन्होंने पहले दिन पहली बात पूछी, “कैमरे में लेंस कौन सा लगाऊँ?”
केदार शर्मा के लिए सवाल बिल्कुल नया था। कौन सा लेंस? उन्हें क्या मालूम कौन सा लेंस। निर्देशन उनके लिए बिल्कुल नया काम था लेकिन विश्वास तो पुराना ही था। बड़े इतमीनान से कहा, “आपके पास जितने भी लेंस हैं, सभी ले आओ। देख कर बताऊँगा।”
मलहोत्रा सभी लेंस ले आये। “मैंने हर लेंस हाथ में लेकर वजन का अंदाजा किया,” केदार शर्मा बताते हैं, जो सबसे भारी लगा, उसे छाँट कर कहा, “यह लगाओ।”
“फिल्म में छाया देवी हीरोइन थीं। उनका एक क्लोजअप लेना था। वह जो लेंस मैंने वजन के हिसाब से छाँटा था, 75 का था, मेरी किस्मत की बुलंदी देखिए, क्लोज अप में 75 का ही लेंस लगता है। बस, सब पर रोब पड़ गया, नया डायरेक्टर बड़ा काबिल है।”
सुंदरी मेहताब का स्नान दृश्य
नौजवान निर्देशक ने एक अटकी हुई फिल्म पूरी करा दी, इस बात की चर्चा फिल्मी हल्कों में काफी रही। फिल्म कार्पोरेशन के चीफ आर. शर्मा ने इस बात का आभार माना। कोरा आभार नहीं, एक और फिल्म निर्देशन के लिए दिलायी जिसका नाम था, ’औलाद ’।
यह फिल्म बनी, चली और खूब चली। केदार शर्मा का नाम निर्देशकों की लिस्ट में चढ़ गया। निर्माता आर. शर्मा, जो स्वयं लेखक भी थे, इन्हीं दिनों ’चित्रलेखा’ बनाने की तैयारी कर रहे थे। उनका इरादा खुद ही इस फिल्म का निर्देशन करने का भी था। लेकिन केदार शर्मा से वे कुछ इस तरह प्रभावित हुए कि यह चित्र भी उन्होंने इन्हें ही दे दिया और इसके निर्देशन ने तो केदार शर्मा की जड़ें फिल्म उद्योग में गहरी जमा दीं। इसी सफलता से वह वट वृक्ष विकसित हुआ जिसकी विभिन्न शाखाएं-लेखन, निर्देशन, निर्माण, प्रशिक्षण और पथ प्रदर्शन आज भी उद्योग को सहारा दे रही हैं।
’चित्रलेखा ’ विशेष सफल फिल्म तो थी ही, उसके बारे में विवाद भी बहुत रहे। बहुत से लोगों ने कहा कि युवा केदार अति आधुनिकतावादी हैं, उनके विचार फिल्मों में ज्यादा नहीं चलेंगे। इन लोगों का इशारा नायिका मेहताब के स्नान दृश्य की ओर था। केदार शर्मा का कहना था कि यह कोई नयी चीज वे नहीं दे रहे हैं। वे अपने को तब भी संस्कारी भारतीय मानते थे और आज भी पश्चिमी आधुनिकता के साथ समझौता करने में अपने आपको असमर्थ मानते हैं।
मेहताब अपूर्व सुंदरी थीं। “उससे ज्यादा खूबसूरत शरीर मैंने आज तक नहीं देखा।” केदार शर्मा कहते हैं, “उसके ख्याल से मुझे एक ही बात याद आती है, ’ए थिंग आफ ब्यूटी, इज ए जाय फार एवर’।”
उस खूबसूरत अभिनेत्री का वह वस्त्रविहीन स्नान दृश्य फिल्म ’चित्रलेखा’ में होगा, यह तब के दर्शकों के लिए सनसनीखेज खबर थी। अपनी अन्य विशेषताओं के अलावा यह फिल्म इसी दृश्य की वजह से चिर स्मरणीय बन गयी है।
“कला के प्रति समर्पित उस अभिनेत्री का साहस मैं कभी भूल नहीं सकूंगा,” केदार शर्मा कहते हैं। ’जब मैंने उससे यह वस्त्रविहीन स्नान दृश्य करने के बारे में पूछा तो उसने कहा था, अगर कहानी के लिए यह जरूरी है तो मैं इसे जरूर करूंगी। मेरे शरीर में भद्दा कुछ भी नहीं है जिसे मैं छिपाना चाहूँ।’
“उसने सिर्फ एक शर्त रखी थी कि शाट के समय कोई अन्य व्यक्ति सेट पर मौजूद न रहे और निर्देशक (केदार शर्मा) स्वयं उस शाट को लें। उसकी यह शर्त पूरी ईमानदारी के साथ निभाई गयी थी।”
मैं आपका कल आप मेरे भविष्य...
’कल के छोकरे’ केदार शर्मा को फिल्म उद्योग का स्तंभ बनाने में जिन लोगों का हाथ रहा है, सभी के नाम केदार शर्मा बड़ी श्रद्धा के साथ लेते हैं- सरदार ठाकुर सिंह, पृथ्वीराज कपूर, सहगल, दुर्गाबाई खोटे, देवकी बोस, बी.एन. सरकार...
एक नाम ऐसा भी है जिससे केदार शर्मा बहुत प्रभावित थे लेकिन पहली ही भेंट में जिसके साथ मतभेद हो गया। यह व्यक्तित्व था गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर। केदार शर्मा बहुत समय से उनसे मिलने के इच्छुक थे। मौका अचानक ही हाथ आ गया। उनके पहचान का कोई परिवार गुरुदेव से मिलने जा रहा था। केदार शर्मा भी साथ चले गये।
अपने निवास स्थान में एक कमरे में गद्दे और गाव तकिये पर गुरुदेव अधलेटे से थे। एक पाँव घुटने पर रखा हुआ था। सफेद कपड़े, दाढ़ी बाल सब सफेद।
साथ के सभी लोग एक एक करके आगे बढ़े और घुटने पर टिकाया हुआ गुरुदेव का पैर चूम चूम कर बैठते रहे। केदार शर्मा की बारी सबसे बाद में आयी। दोनों हाथ जोड़ कर नमस्कार करते हुए उन्होंने कहा, “मुझे क्षमा कीजिए, मैं आपके चरण नहीं चूमूँगा।”
“क्यों?” गुरुदेव ने विस्मय से युवक केदार शर्मा को देखा।
“क्योंकि आप मेरे भविष्य हैं और मैं आपका गुजरा हुआ समय हूँ। फिर यह औपचारिकता क्यों हो?”
गुरुदेव मुस्कराये, “तुम यहाँ बैठो, मेरे साथ,” उन्होंने कहा और केदार शर्मा को अपने साथ गद्दे पर बिठा लिया।
बाद में केदार शर्मा उनसे फिर मिले, उन्हें अपनी एक पुस्तक भेंट की और काफी समय कविता की चर्चा में बीता।
पटकथा स्पर्श का दोष
तब केदार शर्मा न्यू थियेटर्स में ही थे। नयी उम्र थी और नया सब कुछ सीख लेने की उमंग थी। वे देखते थे कि शूटिंग की प्रगति, सभी कुछ पटकथा को देख देख कर ही किया जाता है। उन्हें बड़ी उत्सुकता हुई कि देखें आखिर पटकथा में क्या, किस तरह लिखा होता है।
एक दिन जब वे किसी फिल्म की पटकथा को देखने के लिए उठा ही रहे थे, एक कर्मचारी की नजर उन पर पड़ गयी। उसने कुछ इस ढंग से शोर मचा दिया जैसे केदार शर्मा कोई चोरी करते पकड़े गये हो। बात अधिकारियों तक भी पहुँची और हर जगह से केदार शर्मा को पटकथा छूने के अपराध में फटकार मिली।
तिरस्कार और फटकार के इन क्षणों के बीच केदार शर्मा ने निश्चय किया था कि कभी समर्थ बन कर यह साबित करूंगा कि पटकथा कोई छिपा कर रखने की चीज नहीं है। खास कर नये लोगों को लाकर पहले उनके साथ में यही दूंगा- “लो, इसे देखो, यह मेरी फिल्म की पटकथा है।”
तबसे अब तक नये लोगों को प्रोत्साहन देने का उनका सिलसिला जारी ही है।
नव नक्षत्रों के स्वजन कुटुंबी
जो लोग केदार शर्मा के पास रह कर प्रशिक्षित हुए और बाद में जिन्होंने फिल्म उद्योग में ऊँचा नाम कमाया उनकी सूची बहुत लंबी है। इनमें से कुछ प्रमुख नाम हैः अभिनेत्री रमोला, अभिनेता ज्ञानी, राज कपूर, गीता बाली, मधुबला, मोनिका देसाई, मेहताब, कमल मेहरा, शशिकला, माधवी, संगीत निदेर्शक रोशन, जमाल सेन, माला सिन्हा, तनूजा, जगदेव, जेब रहमान, बैंबी....
अभिनेत्री रमोला में केदार शर्मा को प्रतिमा की झलक तभी नजर आ गयी थी जब वे स्वयं निर्देशक नहीं थे। रमोला को वे न्यू थियेटर्स ले गये थे, कुछ काम दिलाने के लिए। रमोला का कद छोटा था। इस पर व्यंग करते हुए किसी ने पूछा, “अप लड़की तो लाए हैं, साथ में ईंटे भी लाए कि नहीं? रमोला का चेहरा उतर गया। केदार शर्मा भी वापस आ गये पर उन्होंने रमोला को आश्वासन दिया, “फिकर मत कर लड़की, जिस दिन मैं डायरेक्टर बनूँगा, मेरी फिल्म की हीरोइन तू ही होगी।”
सुनकर रमोला रोते रोते हँस दी थी, “शर्मा जी, न कभी आप डायरेक्टर होगे, न मैं कभी हीरोइन बन सकूँगी।”
वक्त का पहिया अपनी रफ्तार चलता रहा और एक दिन रमोला हैरान रह गयी यह सुनकर कि निर्देशक केदार शर्मा ने उसे अपनी फिल्म में हीरोइन बनने बुलवाया है। इनसे साथ काम करने के बाद ही वह पंचोली की फिल्मों में गयी थी।
’चित्रलेखा’ में ज्ञानी ने महत्वपूर्ण भूमिका की थी। एक शाट चल रहा था जिसमें उसे रोना था। उसकी खासियत यह थी कि वह बिना ग्लिसरीन आँखों में आँसू भर लाता था। इस शाट में बार बार कुछ गड़बड़ी हो रही थी। 12 रिटेक जब हो चुके, केदार शर्मा ने अपने सहायक से कहा, “ज्ञानी जी को ग्लिसरीन दो उसके बिना कब तक रोएंगे?”
“मुझे ग्लिसरीन देकर मेरे गुरु का अपमान मत करो।” ज्ञानी ने सहायक से कहा। “केदार शर्मा के लिए 12 तो क्या, 100 रिटेक भी बिना ग्लिसरीन करूँगा।”
गीता बाली आयी तो इस कदर भोली थी कि वह भोलापन ही केदार शर्मा को भा गया। लेकिन दूसरे लोगों को लड़की बहुत डल लगी। ’सुहागरात’ फिल्म में उसे नायिका लेकर जब शूटिंग शुरू की तो बाकी लोग इतने बोर हुए कि उसे बदलने की हठ कर बैठे।
गीता के साथ उसकी माँ भी आया करती थीं। ’इनोसेंस’ में गीता से वह एक कदम आगे ही निकलीं। गीता डायलाग बराबर नहीं बोल पा रही थी। इसलिए उन्होंने अपनी तरफ से तजवीज रखी, “शर्मा जी लड़की जितना बोल बाती है, उतना ठीक है। बाकी की फिक्र न कीजिए, मैं बोल दूँगी।
राज कपूर को पृथ्वीराज कपूर ने निर्देशन का प्रशिक्षण पाने भेजा था। उसको शुरूआत करायी थी ’क्लैपर बाॅय’ के काम से। नयी नयी उम्र का यह नौजवान बेहद शौकीन मिजाज चीज था। शर्मा जी जब भी क्लैप देने को कहें, वह पहले जेब से कंधी निकाल कर बाल सँवारता था, फिर कैमरे के सामने क्लैपबोर्ड लाकर अपना चेहरा इस तरह साथ सटा लेता था कि वह हर हालत में आ ही जाय।
उसकी यह हालत देखकर केदार शर्मा को लगा था कि आज की इसकी यह नादानी जरूर इसे बड़ा अभिनेता बना कर रहेगी। और जब एक बार उन्होंने उसको समझाने के लिए इस तरह की बात कही तो वह बोला था, “नहीं जी, मैं तो बस ’कामेडियन’ बनूँगा।”
और एक दिन वह सचमुच ही कामेडी जैसी हरकत कर बैठा। केदार शर्मा आउटडोर में एक अभिनेता पर शाट ले रहे थे। बैकग्राउण्ड में सूर्यास्त का दृश्य लेना था। इसलिए उन्हें जल्दी थी कि सूरज डूबने के पहले पहले ही शाट ओ.के. हो जाय।
सारी तैयारी हो गयी, शाट शुरू हुआ। राज कपूर ने आदत के अनुसार क्लैप के पहले बाल बनाये, फिर कैमरे के सामने अपने चेहरे को बढ़ाते हुए, बगैर क्लैपबोर्ड की तरफ ज्यादा ध्यान दिये जो क्लैप मारा तो उस अभिनेता की नकली दाढ़ी क्लैप के बीच फंस कर निकल आयी। यूनिट के सब लोग हँस पड़े लेकिन शाट खराब हो जाने से केदार शर्मा को इतना क्रोध आया कि उन्होंने एक करारा झांपड़ राज कपूर को रसीद कर दिया।
आज जब राज कपूर केदार शर्मा के किसी सहकारी से मिलते हैं, उनका पहला सवाल यही होता है, “शर्मा जी से झांपड़ पड़ा कभी?”
मेरे कलाकार मेरे भगवान
इतने लोगों को केदार शर्मा ने प्रशिक्षित किया, वे एक से एक बड़ी जगहों पर पहुँच गये। आलीशान बंगले, एयरकंडीशंड आफिस, लंबी कारें सब ले लिया पर केदार श्र्मा वहीं हैं, श्री साउंड स्टूडियो के उसी साधारण आफिस में जहाँ कभी राज कपूर आकर बाहर खड़ा रहता था, कभी मधु बाला कभी माला सिन्हा आती थी, सुनहरे भविष्य की कल्पना को साकार करने के लिए।
उनके द्वारा मुझे पैसा कमाना होता तो हर एक के साथ पहले एग्रीमेंट कर लिया करता कि आय का इतना प्रतिशत मैं लिया करूंगा। आज यह चलन खूब नजर आ रहा है। मैंने एक प्रतिशत भी तै किया होता तो अगली पीढ़ी तक बिना काम किये खा सकती थी।”
शायद यही वजह है कि केदार शर्मा को आज भी किसी बड़े स्टार के आगे झुकने की जरूरत नहीं पड़ती। पैसा उन्होंने नहीं लिया, दिया ही है। फिल्म उद्योग में यह बात मशहूर है कि अपनी फिल्म के जिस किसी कलाकार पर वे प्रसन्नत हो गये, तुरंत जेब से दुअन्नी निकाल कर उसे दे दी। अब यह रेट उन्होंने बढ़ा कर 20 पैसे कर दिया है, क्योंकि दुअन्नी रही ही नहीं।
सुखी संपन्न परिवार
12 अप्रैल सन 1910 को नारोवाल जिला स्यालकोट में जन्मे केदार शर्मा अपने पारिवारिक जीवन में बहुत सुखी और संतुष्ट हैं। उनकी पत्नी श्रीमती राज शर्मा हिंदी की उच्च परीक्षाएँ पास हैं। वक्त जरूरत केदार शर्मा उनकी मदद अपने लेखन कार्य में लेते रहते हैं। लेखन व संगीत दोनों से ही उन्हें लगाव है।
शर्मा जी के दो पुत्र हैं और एक पुत्री। बड़े बेटे विक्रम शर्मा ग्लैक्सो कंपनी की कलकत्ता शाखा में सेल्स मैनेजर हैं और अब तक अविवाहित। पुत्री प्रभा उनसे छोटी हैं। वे एम.एससी. पास हैं और बहुत बढ़िया गायिका भी। मांट्रियाल (कनाडा) के व्यवसायी इंदर शर्मा से उनका विवाह हुआ है। उनके दो बच्चे भी हैं।
छोटे पुत्र अशोक शर्मा, जिन्होंने केदार शर्मा की फिल्म ’हमारी याद आयेगी’ में नायक की भूमिका की थी, आजकल मांट्रियाल में ही हैं। वे प्रसिद्ध मासिक प्रत्रिका ’रीडर्स डाइजेस्ट’ में आर्ट डायरेक्टर के रूप में काम कर रहे हैं। उन्होंने एक जर्मन युवती से विवाह किया है और उनकी एक पुत्री है, रेणुका।
निर्माण का आधार
फिल्म निर्माण और फिल्म संगीत के बारे में केदार शर्मा का एक स्पष्ट मत रहा है-भारतीयता। “अपनी संस्कृति, अपने रीति रिवाजों और अपने देश में इतना कुछ भरा पड़ा है कि किसी चीज के लिए बाहर के देशों का अनुकरण करने की जरूरत ही कहीं नहीं है।” वे कहते हैं, “लेकिन अफसोस यह देख कर होता है कि हर दूसरी फिल्म में विदेश कुछ इस तरह घुसा होता है कि निकाले नहीं निकल सकता।
पश्चिमी चीजें बुरी हैं, यह केदार शर्मा नहीं कहते। भारतीय संगीत के बीच विदेशी वाद्य, या भारतीय जनजीवन के बीच जोड़ी गयी पश्चिमी सभ्यता से उन्हें शिकायत होती है। “जब कोई अंगरेज हमारा मित्र हो जाता है तो हम उसे अपने घर भी ले जाते हैं, उसका स्वागत, सेवा, सत्कार सभी कुछ करते हैं। लेकिन यह तो नहीं कहते कि आज से आप हमारी रिश्तेदारी और बिरादरी में आ गये। न हम ऐसा कहना चाहेंगे, न वह आकर ’एडजस्ट’ हो सकेगा। लेकिन हमारी फिल्मों ने यही किया है।
“मैं कई बार असफल हुआ हूँ। हो सकता है आगे भी मेरी यह नीति मुझे बदले हुए समय में सफल न होने दे, लेकिन भारतीय संस्कृति में मिलावट मेरे किये नहीं हो सकेगी।”
फिल्मों की सूची
जिन फिल्मों से केदार शर्मा किसी न किसी रूप में संबद्ध रहे हैं, उनकी सूची बहुत लंबी है। इन फिल्मों का ब्योरा इस प्रकार हैः
आफ्टर द अर्थक्वेक: 1935, छोटी हास्य भूमिका, निर्माताः न्यू थियेटर्स, निर्देशकः देवकी बोस।
देवदास: 1935, संवाद तथा गीत लेखन, निर्माताः न्यू थियेटर्स, निर्देशकः बरुआ।
करोड़पती: 1936, संवाद तथा गीत लेखन, निर्माताः न्यू थियेटर्स, निर्देशकः हेमचंद्र।
अनाथाश्रम: 1937, संवाद तथा गीत लेखन, निर्माताः न्यू थियेटर्स, निर्देशकः हेमचंद्र।
विद्यापति: 1937, कुछ गीत, निर्माताः न्यू थियेटर्स, निर्देशकः देवकी बोस।
सबेरा: 1942, संवाद तथा गीत लेखन, निर्माताः न्यू थियेटर्स, निर्देशकः देवकी बोस।
जिंदगी: 1940, संवाद तथा गीत लेखन, निर्माताः न्यू थियेटर्स।
औलाद: 1941, कहानी, पटकथा, संवाद, गीत लेखन तथा निर्देशन, निर्माताः फिल्म कार्पोरेशन।
चित्रलेखा: 1941, संवाद, गीत लेखन तथा निर्देशन, निर्माताः फिल्म कार्पोरेशन, प्रमुख कलाकारः मेहताब, ज्ञानी, नांद्रेकर, मोनिका देसाई।
अरमान: 1942, कहानी, पटकथा, संवाद, गीत लेखन तथा निर्देशन, निर्माताः रंजीत मूवीटोन, प्रमुख कलाकारः मोतीलाल, शमीम।
गौरीः 1943, कहानी, संवाद, गीत लेखन तथा निर्देशन, निर्माताः रंजीत मूवीटोन, प्रमुख कलाकारः प्रथ्वीराज कपूर, मोनिका देसाई।
विषकन्या: 1943, कहानी, संवाद, गीत लेखन और निर्देशन, निर्माताः रंजीत मूवीटोन।
भंवरा: 1944, कहानी, संवाद, गीत लेखन और निर्देशन, निर्माताः रंजीत मूवीटोन।
कलियां: 1944, कहानी, पटकथा, संवाद, गीत लेखन, निर्देशन तथा अपनी निर्माण संस्था ओरियंटल पिक्चर्स के लिए निर्माण भी।
नीलकमल: 1947, कथा, पटकथा, संवाद, गीत लेखन तथा निर्देशन, निर्माताः ओरियंटल पिक्चर्स, प्रमुख पात्रः राज कपूर, मधुबाला।
सुहागरात: 1948, कहानी, पटकथा, संवाद, गीत लेखन और निर्देशन, निर्माताः ओरियंटल पिक्चर्स, प्रमुख कलाकारः गीता बाली, भारत भूषण, बेगम पारा।
बावरे नैन: 1950, कहानी, पटकथा, संवाद, गीत लेखन और निर्देशन, निर्माताः केदार शर्मा की ही निर्माण संस्था एंबीशस पिक्चर्स, प्रमुख पात्रः राज कपूर, गीता बाली।
जोगन: 1950, सिर्फ निर्देशन, निर्माताः रंजीत मूवीटोन, प्रमुख पात्रः दिलीप कुमार, नरगिस।
नेकी बदी: 1949, कथा, पटकथा, संवाद, गीत लेखन, निर्देशन तथा नायक के रूप में अभिनय, निर्माताः एंबीशस पिक्चर्स।
ठेस: 1949, कहानी, पटकथा, संवाद, गीत लेखन तथा निर्देशन, निर्माता: ओरियंटल पिक्चर्स।
छोरा छोरी: 1955, कहानी, पटकथा, संवाद, गीत लेखन तथा निर्देशन, निर्माताः केदार शर्मा की अपनी निर्माण संस्था, शो पीपल।
शोखियां: 1951, कथा, पटकथा, संवाद, गीत लेखन तथा निर्देशन, निर्माताः एंबीशस पिक्चर्स।
रंगीन रातें: 1956, कथा, पटकथा, संवाद, गीत लेखन तथा निर्देशन, निर्माता: एंबीशस पिक्चर्स।
काकीकूडा: (मलयन भाषा में) सिर्फ निर्देशन, निर्माताः शा ब्रदर्स सिंगापुर।
जलद्वीप: 1956, लेखक तथा निर्देशक, निर्माता: चिल्ड्रेंस फिल्म सोसाइटी।
स्काउटकैंप: लेखक तथा निदेशक, निर्माता: चिल्ड्रेंस फिल्म सोसाइटी।
गंगा की लहरें: लेखक तथा निर्देशक, निर्माताः चिल्ड्रेंस फिल्म सोसाइटी।
मीरा का चित्र: लेखक तथा निर्देशक, निर्माताः चिल्ड्रेंस फिल्म सोसाइटी।
हमारी याद आयेगी: 1961, कथा, पटकथा, संवाद, गीत लेखन तथा निर्देशन, निर्माता: शो पीपल।
फरियाद: 1964, कथा, पटकथा, संवाद, गीत लेखन तथा निर्देशन, निर्माताः शो पीपल।
चित्रलेखा: (रंगीन) 1964, लेखन तथा निर्देशन, निर्माताः पुष्पा पिक्चर्स, प्रमुख पात्रः अशोक कुमार, मीना कुमारी, प्रदीप कुमार, महमूद।
मयखाना: 1966, कहानी, पटकथा, संवाद, गीत लेखन और निर्देशन, निर्माताः शो पीपल।
प्यासे नैन: (निर्माणाधीन) कहानी, पटकथा, संवाद, गीत लेखन और निर्देशन, निर्माताः शो पीपल।
This article was published in 'Madhuri' magazine's 16 April 1971 edition.
The images and captions are from the original article.

