Released in 1986, Jaanbaaz remains one of the most stylish and ambitious films of 1980s Hindi cinema. Produced and directed by Feroz Khan, the film blended family drama, romance, action, and crime within a visually lavis...
View on Facebookबहुला अखंड सौभाग्यवती था। किन्तु उसके पति लक्ष्मेन्द्र का देहांत हो गया। उसका वध कर दिया गया और वध करनेवाला भी कोई कोई साधारण व्यक्ति न था। वो थी मनसा देवी, स्वयं भगवान शिव शंकर की मानस-पुत्री। देवी ने नागिन बनकर बहुला के पति को डस लिया था।
बेहुला साधारण स्त्री होकर भी मनसा देवी से भिड़ गई। अखण्ड सौभाग्य उसका अधिकार था। अपने अधिकार के लिये उसने त्रिलोक में हाहाकार मचा दिया।
पृथ्वा लोक पर मनसा देवी को कोई नहीं जानता था। भगवान शंकर के परिवार में लोग मां पार्वती, गणेश और कार्तिकेय से परिचित थे।
एक दिन नारद मुनि ने मनसा से कहा-मनसा देवी! भगवान शंकर ने तुम्हें पाताल लोक का राज्य देकर तुमसे छुटकारा पा लिया है। पृथ्वी लोक पर तुम्हारे भाइयों की तो पूजा होती है किन्तु तुम्हें कोई जानता तक नहीं।
पृथ्वी लोक में महाप्रतापी राजा, सम्राट चन्द्रधर भगवान शंकर के परम भक्त थे। नारद जी ने मनसा को इन्हीं के पीछे लगा दिया। मनसा ने सोचा यदि चन्द्रधर उसकी पूजा करने लग गया तो सारा संसार उसकी पूजा करेगा। किन्तु चन्द्रधर अपने इष्टदेव के अतिरिक्त और किसी की पूजा करने की तैयार न थे। मनसा ने उनके छः पुत्रों को अपने कोप की बेदी पर चढ़ा दिया और सातवें के प्राणों की धमकी दे दी। राजा चन्द्रधर ने अपने सातवें पुत्र का विवाह बेहुला से कर दिया।
विवाह तो हुआ, किुन्तु सौभाग्य-रात्रि को ही मनसा ने लक्ष्मेंन्द्र के प्राण ले लिए। सती बेहुला अपने पति का शव लेकर निकल पड़ी। मनसा देवी ने पग-पग पर प्रलय बिछा दिया। किन्तु सती का विश्वास अटल था, अडिग था, अटूट था। वह कलश तक पहुँच गई।
मुनि नारद ने मनसा को चेतावनी दी कि यदि कल सूर्योदय होते ही बेहुला भगवान शंकर के चरणों में पहुँच गई तो लक्ष्मेन्द्र जीवित हो उठेगा और मनसा का स्वप्न सदा के लिए चूर हो जायेगा। मनसा के आदेश से महानाग ने सूर्य देव को ग्रस लिया। चारों और अंधकार छा गया। तापमान शून्य से नीचे उतरने लगा। देवताओं में हाहाकार मच गया। बेहुला को उन्होंने चुनौती दी। सती ने चुनौती स्वीकार की और मां पार्वती की कृपा से सूर्य देव को मुक्त करवाया।
किन्तु सती का भाग्य अंधकारमय ही रहा। निर्दष्ट स्थान पर पहुँच कर भी भगवान शंकर ने उसे लौट जाने का आदेश दिया। कहा- 'विधि का विधान अटल है, सनातन है।' सती विफर उठी। उसने भगवान शंकर को चुनौती दे दी।
बेहुला के सतीत्व और मनसा के प्रकोप की परीक्षाएं होती रहीं। मुनिराज मुस्कराते रहे और सतीत्व का सौभाग्य खण्डित पड़ा रहा। तब क्या हुआ?
क्या बेहुला को अखण्ड सौभग्य प्राप्त हो सका?
क्या मनसा के पाप का घड़ा फूटा?
क्या चन्द्रधर की भक्ति कोई चमत्कार दिखा सकी?
क्या बेहुला ने सिद्ध किया कि वह एक साधारण स्त्री नहीं बल्कि सब सतियों में 'महासती बेहुला' है?
इन प्रश्नों के उत्तर यहां नहीं देंगे।
[From the official press booklet]