Shahenshah (1988) - Preview
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विजय के पिता (कादर खाँ) एक कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदार पुलिस इंस्पैक्टर थे। एक दिन गाँव के बदमाश जे.के (अमरीश पुरी) के ड्राइवर (सुधीर) के हाथों तेज गति से कार चलाते हुए गाँव के एक गरीब किसान के बच्चे की मृत्यु हो गई। पुलिस इंस्पैक्टर ने तुरंत ड्राइवर को गिरफ्तार कर लिया। जे.के. ने अपने ड्राइवर को कानून के चुंगल से बचाने के लिए पुलिस इंस्पैक्टर को तरह-तरह के लालच दिए किंतु इंस्पैक्टर की ईमानदारी को जे.के. की दौलत खरीदने में असफल रही।
फिर जे.के. ने मरे हुए बच्चे के माँ-बाप से मिलकर उन्हें अपने पैसों से खरीद लिया, जिसका परिणाम यह हुआ कि अदालत ने बच्चे की मृत्यु का आरोप ईमानदार पुलिस इंस्पैक्टर के सिर थोप दिया गया। इस अन्याय पर इंस्पैक्टर तिलमिला कर रह गया और जेल से छूटने के बाद उसने गले में रस्सी का फंदा डालकर आत्महत्या कर ली। यह देखकर पूरे गाँव में जे.के. की दहशत फैल गई। पिता की लटकी हुई लाश को देख कर बालक विजय चिल्ला उठाः पिता जी, आप हिम्मत हार गए। जुल्म का सामना करने की बजाय आपने खुदकशी कर ली। लेकिन आपका बेटा इस रस्सी को उस कमीने के गले में जब तक नहीं लटकाएगा, उसने चैन नहीं आएगा। वक्त आगे बढ़ता रहा। सुख-दुःख आते जाते रहे। पढ़-लिख कर विजय (अमिताभ बच्चन) बड़ा हो गया। उसके दिल में जे.के. से बदला लेने की आग पहले ही दिन की तरह भड़क रही थी। अपने पिता की तरह वह भी पुलिस इंस्पैक्टर बन गया। वह अत्यायार करने वालों का शत्रु था तथा असहायों और दीनों का मित्र। कुछ दिनों बाद उसका तबादला बंबई में हुआ तो वहाँ उसने तमाम अपराधियों की फाइलें देखी। उन्हीं में से एक अपराधी मुख्तार सिंह (प्रवीण कुमार) था, जो मथुरा का एक मामुली ग्वाला था, किंतु अब किसी बड़े गिरोह के चक्कर में आकर जुएखाने का धंधा चला रहा था।
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उसके अड्डे पर छापा मारने से पहले इंस्पैक्टर विजय ने मुख्तार सिंह को नर्मी से समझाया कि वह यह धंधा छोड़ दे किंतु मुख्तार सिंह उलटा धमकियों पर उतर आया इंस्पैक्टर विजय समझ गया कि मुख्तार सिंह की अकड़ यू बेसबब नहीं। उन लंबी-चैड़े आदमी के पीछे कोई बड़ा गिरोह है, इसलिए कोई और तरीका आजमाना होगा। यहीं से शहंशाह का जन्म हुआ। रात के वक्त दाढ़ी लगाए बाल बिखरे चमड़े की जैकेट और चमड़े की काली पैंट पहने, हाथ में रस्सी लपेटे शहंशाह मुख्तार सिंह के अड्डे पर पहुँच गया और सबको धुन कर रख दिया। इसतरह रातोंरात जुए शराब और अय्याशी का अड्डा दूध बेचने वालों की बस्ती में बदल गया।
इस अड्डे का असली मालिक जे.के. था जो गाँव छोड़ कर एक दूसरे बदमाश (प्रेम चोपड़ा) के साथ मिलकर बंबई में तरह-तरह के गैरकानूनी धंधे चला रहा था। जब उसे खबर मिली कि मुख्तार सिंह का अड्डा बंद हो गया तो उसे बहुत गुस्सा आया, क्योंकि उस अड्डे की कमाई का कुछ हिस्सा उसके पास भी पहुँचा करता था। उसने और उसके आदमियों ने शहंशाह को तलाश करने की बहुत कोशिश की, किंतु शहंशाह का सुराग उन्हें कहीं न मिला, क्योंकि इंस्पैक्टर विजय हर अपराध का अंत पहले इंस्पैक्टर की हैसियत से करने की कोशिश करता था और जब असफल रहता था तो रात को शहंशाह बनकर अपराधियों को अपना रास्ता बदलने पर मजबूर कर देता था।

इंस्पैक्टर विजय को अपनी मुंहबोली बहन के हाथ पीले करने की चिंता लगी रहती थी। चूँकि बहन मुस्लिम थी, इसलिए लड़का भी उसी धर्म का चाहिए था। बहुत छानबीन के बाद उसने अपनी बहन की शादी एक ईमानदार, मेहनती और होनहार पत्रकार (विजयेंद्र घटगे) से करा दी।
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इंस्पैक्टर विजय की जिंदगी का उद्देश्य आज भी जे.के की खोज था, किंतु वह बदमाश हाथ नहीं आ रहा था। अलबत्ता उसके काले कारनामों का ब्योरा उसका पत्रकार बहनोई जरूर छापता रहता था। बड़े पुलिस अफसर (प्राण) भी जे.के. की ताक में थे। उधर जे.के. और उसके साथी उस पत्रकार से परेशान थे जो उन्हें बेनकाब करने पर तुला हुआ था। शहंशाह ने अलग उनकी नींद हराम कर रखी थी। वह उनका सामान पकड़ लेता, उनके अड्डे बंद करा देता। पहला वार जे.के. ने पत्रकार पर किया और उसके दफ्तर में पहुँच कर उसकी हत्या कर दी। इस समाचार से सारे शहर में आतंक फैल गया। जब इंस्पैक्टर विजय कब्रिस्तान में अपने बहनोई को कब्र में उतारने के लिए गया तो वहाँ जे.के. ने अपने आदमियों से मृतक पत्रकार के शब पर फूल चढ़ाने को कहा, लेकिन उसी वक्त एक बुजुर्ग पत्रकार बाबा (यूनुस परवेज) ने यह रहस्य खोल दिया कि इस हत्या के पीछे किस का हाथ है। उसी क्षणा झाड़ियों के पीछे से गोलियाँ आकर बाबा के सीने में छलनी कर गई। इंस्पैक्टर विजय ने इन झाड़ियों के पीेछे से गोली चलाने वाले को देख लिया और उसे जा पकड़ा। किंतु अदालत में अपने पैसे और असर-रसूख के बूते पर बाइज्जत बरी हो गया।
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फिर भी इंस्पैक्टर विजय उस व्यक्ति को कभी क्षमा नहीं कर सकता था जिसने उसके खनदान को बरबाद किया था, उसके पिता को आत्महत्या करने पर मजबूर किया था, उसके बहनोई की हत्या की थी। उसने जे.के. से ललकार कर कहा “जे.के.! इस दुनिया की अदालत में तो तुम्हें माफ कर दिया है, लेकिन शहंशाह की अदाल में तुम्हें माफ नहीं किया है।” यह कहते हुए उसने भरी अदालत में उसी रस्सी से जे.के. को फांसी पर लटका दिया जिसे वह हमेशा अपने साथ लिए फिरता था। इसके बाद उसने अदालत के सामने अपने खानदान की तबाही की कहानी सुनाई और यह रहस्य भी खोल दिया कि अपराधियों का सफाया करने वाला शहंशाह वह स्वयं ही है। इस तरह एक खूंखार अपराधी का अंत हो गया और जो लड़की इंस्पैक्टर विजय की हंसी उड़ाती थी और उसी के दूसरे रूप अर्थात शहंशाह से प्रेम करती थी, वह उसकी जिंदगी में हमेशा-हमेशा के लिए बहार बनकर आ गई। उस दिन के बाद इंस्पैक्टर विजय को शहंशाह बनने की जरूरत नहीं पड़ी और इस तरह शहंशाह का व्यक्तित्व को इंस्पैक्टर विजय ने समाप्त कर दिया।
This preview was first published in 'Sushma' magazine's August 1987 (year 29, No. 8) edition.
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