रेश्मी सलवार कुरता जाली का : O P Nayyar
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खाली वक्त में होमियोपैथ के डाॅक्टर, हरे राम हरे कृष्ण से संबंध रखने वाले तथा एक दौर के शीर्ष संगीतकार ओ.पी. नय्यर की फिलहाल तेलुगु फिल्म ’नीराजनम’ से वापसी हुई है। पी. सुशीला तथा बाला सुब्रमण्यम ने नीराजनम में अपने स्वर दिए हैं। ओ.पी. को सक्रिय दौर गुजरे यद्यपि काफी अर्सा हो गया है, पर अपनी मधुर धुनों के साथ वे आज भी श्रोताओं के दिलो-दिमाग पर हावी हैं।
छठे दशक के प्रारंभिक वर्षों में पंजाब से एक युवक जो पटियाला में पैदा हुआ तथा आकाशवाणी केंद्र जालंधर से सरनाम हुआ मायानगरी बंबई पहुँचा। तमन्ना फिल्म संगीत के माध्यम से श्रोताओं के दिलो-दिमाग पर छा जाना था। प्रारंभिक संघर्ष के पश्चात दलसुख एम. पंचोली से मुलाकात हुई। फिल्म ’आसमान’ मिली। पंचोली ने ही आज के चरित्र अभिनेता तथा कल के प्रसिद्ध खलनायक प्राण को भी अपनी फिल्म ’यमला जाट’ में बतौर नायक ब्रेक दिया था। ’आसमान’ के एक गीत के प्रारंभिक संगीत से ही किसी समय ’बिनाका गीतमाला’ का आगाज होता था। यह युवक था ओंकार प्रसाद या ओ.पी. नय्यर। वही ओ.पी. जिसने आशा भोसले की एक विशिष्ठ शैलीगत पहचान बनाई।

प्रारंभिक फिल्मों- ’आसमान, ’बाज’, ’छम छमा छम’, से फिल्मी लोगों ने उन्हें जाना और जब गुरु दत्त ने अपनी संख्या के तहत ’आर पार’, के निर्माण की योजना बनाई, तो संगीत निर्देशन का भार ओ.पी. को सौंपा। यहाँ यह भी बता दूँ कि फिल्म ’बाज’ से दोनों का परिचय हो चुका था और यह भी कि गुरु दत्त प्रोडक्शंस ने ’आर पार’, 'मि. एंड मिसेस. 55', ’सी.आई.डी.’ और ’बहारें फिर भी आऐंगी’ में ओ.पी. को साथ रखा। ’आर पार’ के गीतों ने 1954 में धूम मचा दी थी और वे गीत आज भी प्यारे लगते हैं- कभी आर कभी पार (शमशाद बेगम), ये लो मैं हारी पिया (गीता दत्त)।

उस दौर में एक बाॅस हुआ करता था (आज भी होता है) और एक डांसर, जो उसके क्लब या होटल में डांस किया करती थी। ऐसे क्लब-डांस उस समय प्रचलित थे। नय्यर साहब ने इस तरह के भी कई लोकप्रिय गीत दिए हैं- मेरा नाम चिन चिन चू (हावड़ा ब्रिज), अरे तौबा (12 बजे), हूँ अभी मैं जवाँ (मि. एंड मिसेस. 55), चोर, लुटेरे, डाकू और ये समाँ फिर कहाँ (दो उस्ताद), आदि।
सवाल यह है कि उनमें ऐसा क्या था जिसकी वजह से शंकर-जयकिशन, नौशाद, सचिन दा, मदन मोहन, रवि, रोशन जैसे विद्धहस्त संगीतकारों के होते हुए भी ओ.पी. ने अपने नाम का लोहा मनवाया। उनके संगीत का विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि मधुरता ही उनके संगीत का प्रमुख आकर्षण था। सितार, संतूर, क्लेरनेट, सारंगी तथा सबसे बढ़कर घुँघरुओं की मिठास उनके गीतों में रची-बसी थी। सबसे ऊपर थी रिद्म। ताल वाद्य की रिद्म। तबले एवं ढोलक का जितना खूबसूरत और सही इस्तेमाल नय्यर ने किया, उतना किसी ने नहीं। इन गीतों को सुनिए, आप स्वयं मेरे कथन से सहमत हो जाएँगे- तू लागे मेरा बालमा (श्रीमती 420), रेशमी सलवार कुरता जाली का (नया दौर), यूँ ही बातें न बना तू (कैदी), लेके पहला-पहला प्यार (सी.आई.डी.), जादूगर साँवरिया (ढाके की मलमल), पिया पिया ना लागे मोरा जिया (फागुन), ये देश है वीर जवानों का (नया दौर)। एक लंबा सिलसिला है ऐसे गीतों का।
प्रेेमी मन के उत्साह को प्रकट करने वाले गीतों में प्रेम का एक अनूठा संसार आँखों के सामने उतर आता है। गीत के बोल या शब्द नायक-नायिका को परिभाषित करते प्रतीत नहीं होते और संगीत केवल उनके हृदय का संगीत नहीं होता। श्रोता स्वयं भी उनसे जुड़ जाता है। मसलन- झुका झुका के निगाहें मिलाए जाते हैं (मिस कोका कोला), आँखों ही आँखों में इशारा हो गया (सी.आई.डी.), यूँ मुस्कुरा के सामने आया न कीजिए (कैदी), मैं सोया अँखियाँ मीचे या तुम रूठ के मत जाना (फागुन), दीवाना हुआ बादल (कश्मीर की कली)।

ताँगे का चलना तथा घोड़ों के टापों को संगीतमय आधार ओ.पी. नय्यर ने दिया और यह भी एक परंपरा बन गई। बाप रे बाप, तुमसा नहीं देखा, नया दौर, दो दिलों की दास्ताँ, हावड़ा ब्रिज तथा सावन की घटा में ऐसा एक-एक गीत मिलता है। साजों का माधुर्य एवं गंभीर रूप भी नय्यर के गीतों में है। कुछ गीत तो साजों की अपनी नफासत की वजह से ही मकबूल हुए, जैसे- बेकसी हद से जो गुजर जाए (कल्पना) में सारंगी का प्रयोग, मेरी जान तुझ में सदके (सावन की घटा) में सितार, जब सावन लहराया (छू मंतर) एवं तोम ताना देरे ना देरे ना (ढाके की मलमल) में घूँघरू का सुंदर प्रयोग, पिया पिया ना लागे मोरा जिया (फागुन) में बाँसुरी के स्वर, बहुत शुक्रिया बड़ी मेहरबानी (एक मुसाफिर एक हसीना) एवं ख्यालों में मेरे आए हुए (दो उस्ताद) में हारमोनियम की मिठास मिलती है।

किशोर कुमार ने नय्यर के संगीत में गीत उन्हीं फिल्मों में गाए हैं जिनमें वे स्वयं नायक थे- भागम भाग, नया अंदाज, कल्पना, रागिनी, कभी कभी अंधेरा कभी उजाला, छम छमा छम, बाप रे बाप इत्यादि। नय्यर के संगीत में किशोर अपने स्वाभाविक अंदाज में हैं। नई आवाजों में दिलराज कौर भी कुछ गीत गा चुकी है। सबसे प्रमुख तो यह कि तलत महमूद भी उनकी फिल्म सोने की चिड़या में थे।
माया नगरी बंबई ने यद्यपि उन्हें भुला दिया है, पर उनके बनाए गीतों पर अभी समय की जंग नहीं लगी है, वे आज भी उतने ही मधुर एवं ताजा हैं जितना बीते दौर में थे।
ओ.पी. नय्यर के दस श्रेष्ठ गीतः
1. कभी आर, कभी पार (शमशाद बेगम/आर पार)
2. लेके पहला-पहला प्यार (शमशाद-रफी/सी.आई.डी.)
3. यह देश है वीर जवानों का (रफी-बलबीर/नया दौर)
4. एक परदेसी मेरा दिल ले गया (आशा-रफी/फागुन)
5. रात भर का है मेहमाँ अंधेरा (रफी/सोने की चिड़िया)
6. सुरमा मेरा निराला (किशोर कुमार/कभी अंधेरा कभी उजाला)
7. अपना तो जमाने में (किशोर कुमार/नया अंदाज)
8. चल अकेला, चल अकेला (मुकेश/संबंध)
9. मन मोरा बावरा (रफी/रागिनी)
10. यूँ तो हमने लाख हँसी (रफी/तुमसा नहीं देखा)
This article is taken from सरगम का सफर : नई दुनिया, जून 1989, written by Swarup Vajpayee.
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