Released in 1986, Jaanbaaz remains one of the most stylish and ambitious films of 1980s Hindi cinema. Produced and directed by Feroz Khan, the film blended family drama, romance, action, and crime within a visually lavis...
View on Facebookकहते हैं विश्वास पहाड़ों को भी हिला सकता है।
यह एक ऐसी ही नारी के विश्वास की कहानी है जिसे एक नाग पर इतनी आस्था और श्रद्धा थी कि वह उसको ही अपना देवता मानती थी और उसकी भक्ति में ऐसे खो जाती थी जैसे मीरा अपने कन्हैया के ध्यान में खो जाती थी।
वह थी गौरी, जो ऊटी के एक एस्टेट में काम करनेवाले मामूली कर्मचारी शंभुनाथ की पौत्री थी। बचपन में किसी ज्योतिषी ने उसे कह दिया था, कि उसकी कुंडली में सर्पदोष है और निवारण का उपाय यह बताया था कि वह हर सोमवार को व्रत रखे तथा नागदेवता की पूजा करें। बस, तब से वह नाग की पुजारिन बन गई।
गौरी का ब्याह नागदेवता की कृपा से उस एस्टेट के मालिक राजन से हो गया, पर शादी की रात को ही गौरी के दिल को एक जबरदस्त धक्का पहुंचा, जब उसने सुना कि राजन सापों से सख्त नफ़रत करता है और उन्हें अपना दुश्मन समझता है। फिर भी वह पति से चोरी चोरी अपने नागदेवता की पूजा करती रही, क्यांेकि नाग की पूजा उसके जीवन का एक अंग बन गया था, वह उसे छोड़ नहीं सकती थी।
इधर राजन के एस्टेट का मेनेजर अशोक, जिसकी नज़र राजन की दौलत पर थी, गौरी को राजन के जीवन से हटाकर, उसकी जगह पर अपनी बहन शोभा को लाना चाहता था और एक के बाद एक चाल चलता जा रहा था। मगर उसकी हर चाल, हर साजिश को नाग निष्फल कर देता था।
एक बार संजोग ऐसा हुआ कि जब राजन और गौरी कुछ दिन अपनी एस्टेट में गुज़ारने के लिए गए थे तब राजन ने गौरी को नाग की पूजा करते हुए देख लिया। पति-पत्नी के बीच इस बात को लेकर बड़ा संघर्ष हुआ। राजन ने कहा कि वह सांपों को इसलिए दुश्मन समझता है कि उसकी माँ जो स्वयं एक नाग की पुजारिन थी नाग के डसने से मरी थी और तबसे उसने सौगंध खाई थी कि वह जब भी जहां भी कोई सांप देखेगा, उसे कुचल डालेगा, रौंड डालेगा। मगर गौरी ये मानने के लिए तैयार नहीं थी। उसने नाग के बचाव में यह कहा कि नाग किसी पर तभी वार करता है जब उसे कोई छेड़ता है या उसे मारने की कोशिश करता है।
मगर राजन की मनःस्थिति किसी भी प्रकार की दलील स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। अंत में उसने गौरी के हाथ में बंदूक देकर उसे कहा “अगर तुम्हें मुझसे सच्चा प्यार है तो अपने हाथों से उस ज़हरिले सांप को मारकर फिर मेरे घर में क़दम रखना। नहीं तो समझ लो गौरी, आज से हमारे सारे रिश्ते टूट गये। तुम मेरी कुछ नहीं लगती, मैं तुम्हारा कुछ नहीं लगता।” इतना कहकर वह गौरी को छोड़कर चला गया, और गौरी बिलखती, पड़पती रह गई।
उधर राजन की दौलत को हड़प करने के लिए एक तीसरा आदमी भी आ पहुंचा, सुरेश, जो शोभा का पुराना प्रेमी था।
अब राजन के विरुद्ध षडयंत्र करनेवाले वक्ति दो से तीन हो गए और राजन रह गया अकेला।
इन षडयंत्रियों का क्या अंजाम हुआ? गौरी के विश्वास ने कैसे पति-पत्नी का पुनर्मिलन करवाया, यह जानने के लिए देखिए- देवर फिल्मस कृत “शुभ दिन”।
(From the official press booklet)