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Pahle Aap (1944)

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  • Release Date1944
  • GenreDrama
  • FormatB-W
  • LanguageHindi
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हिन्दुस्तान के वह दिन जो इतिहास के पन्नों में मोतियों की तरह चमक रहे हैं, आज भी अंधी आंखों में उसी तरह लहरा रहे हैं जिस तरह लाखों वर्षों के चाँद की किरने, आज भी हमारी आंखो के पानीमें लहराती हैं, समयकी करवटने हमारी शक्तियोंको दफ़ना दिया, लेकिन हमारा खान्दानी अभिमान अब भी हमारे दिलोंमें दबी हुई चिनगारी की तरह छुपा हुआ है, हमने मेहमानीमे सब कुछ खोदिया, मगर मेहमान नवाजी का इरादा अब भी हमसे दूर नहीं हुआ है, खंडहर मे जलता हुआ दीपक राहगीरके रास्ते का साथी नहीं बनसका परन्तु अपने घर की उखड़ी हुई ईंटों का अब भी पहरेदार बना हुआ है, इसी दीपक की टिमटिमाती हुई रोशनीमे हम मुगलपुरे की छोटीसी बस्तीमें तीन अनोखे दोस्तों की कहानी, स्वार्थी और लालची दुनिया को सुनाने चले है।

पंजूमियां नवाबों के खान्दान की यादगार थे, ज्योतिप्रसाद राणापरिवार के डूबते हुये सूर्य की आखिरी चमक थे और छोटेलाल थे मुग़लपुरे के अत्याचारी और खुदगर्ज़ ज़मीदार के राम जैसे बेटे, तीनों में सगे भाइयों से भी अधिक प्रेम था, और आपसमें एक दूसरे पर मर मिटते थे, एक दिन मछली के शिकार में तीनो दोस्त जवानीका खेल खेल रहे थे कि छोटेलालका कांटा एक सुन्दर हिरनी के अछूते आंचलसे उलझ गया वह हिरनी थी गाँ के चैधरी रामू की लाडली बेटी, और जिसका नाम था रागिनी। जितना मीठा नाम था उससे ज्यादा मीठी थी उसकी हंसी, और हंसी से भी ज्यादा मीठा था उसका गुस्सा, मोहब्बतने विधाता की इस खूबसूरत तितली की आंखोंमें आंसू भर दिये, और छोटेलाल भी प्रेम के तीरों से कांटे में फंसी हुई पछली की तरह तड़पने लगे, नवाब साहब और राणा साहब की तमाम कोशिशें थक गई मगर उस रूढी और सामाजिक दीवार कौन तोड सकी जो दो प्रमियों के बीच में ज़मीदारने खड़ी करदी थी, जख्मी छोटेलाल ने मजबूर होकर अपने पांव नई दुनिया की तरफ बढ़ादिये, पंजूमियां और ज्योतिप्रसाद भी अपनी अपनी वीवियों से तंग आ कर उस तरफ़ चलदिये जहां खान्दानी अभिमान उन्हें दावत दे रहा था।

क्या तीनों बिछडे हुये दोस्त फिर एक साथ मिलकर हँसे?
क्या प्रेमियों की अंधेरी रात फिर जगमगाई?
क्या जमींदार के पत्थर दिलमें इन्सानियत के झरनें बहने लगे?
इनसब बातों का जवाब कौन देगा?
कहानी का पर्दा, या पहले आप?

[From the the official press booklet]
 

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